छपरा बिजली विभाग: सुधार की ओर

बिजली विभाग का नाम सुनते ही लोगों के मन में एक भ्रष्ट एवं लेट लतीफी कार्यशैली वाली जगह की तस्वीर उभर आती है। अक्सर विद्युत् उपभोक्ताओं के खट्टे मीठे अनुभव सुनने को मिलते रहते हैं। बिजली आज हमारी मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है, और आज सभी को इसकी जरूरत है। छपरा में पिछले कुछ समय से बिजली की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। यहाँ विद्युत् आपूर्ति किसी भी मेट्रो शहर के तुलना में कम नही है। वैसे तो लोगों के मिश्रित अनुभव आज भी हैं और आगे भी रहेंगे, परंतु अभी हाल ही में मेरा एक सुखद अनुभव रहा, जिसे मैं आपके साथ शेयर करने से खुद को रोक नहीं सका।

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अभी कुछ दिनों पहले घटी बिजली विभाग से संबंधित एक अविस्मरणीय घटना मैं साझा कर रहा हूँ। बिजली कनेक्शन डिसकनेक्ट करवाने एवं मीटर वापस करने की प्रक्रिया जानने के लिए मैंने कस्टमर केयर को कॉल किया। उनसे मुझे पुरे प्रक्रिया की जानकारी एवं AEE Chapra (Rural) का फ़ोन नंबर मिला ताकि मैं सुगमतापूर्वक इसे करा सकूँ। मैंने श्री शशि चंद्र भूषण (AEE Chapra, Rural) को कॉल किया, उन्होंने बहुत ही सहयोगात्मक रवैया दिखाते हुए मुझसे बात की और बिजली कार्यालय में आने के लिए कहा। मैं केवल तीन दिन के लिए छपरा में था और मुझे इसी अवधि में यह कार्य पूर्ण करना था। इस चिंता से भी मैंने श्री भूषण को अवगत कराया।

मैं अपने सारे ज़रुरी कागज़ के साथ बिजली विभाग पहुंचा और श्री भूषण से मिला, उन्होंने आवेदन और बकाया बिल भुगतान की कॉपी देखकर लाइन मैन को विद्युत् विच्छेदन का आदेश दे दिया। लाइन मैन की कुछ व्यक्तिगत कारण से मीटर हटाने और विद्युत् विच्छेदन में दो दिन लग गए। तीसरे दिन मैं DCMR स्लिप लेने एवं अंतिम बिल भुगतान के लिए विभाग पंहुचा। अपराह्न तक मैं प्रतीक्षा करता रहा परन्तु लाइन मैन फील्ड वर्क पर था और रिपोर्ट सबमिट नहीं की थी। मुझे उसी शाम छपरा से बाहर जाना था। फिर मैं श्री भूषण से मिला और अपनी समस्या बताई। उन्होंने तत्परता दिखाते हुए रिपोर्ट मंगाई और उसे स्वीकृत कर दिया और आगे की कार्यवाही के लिए भेज दिया।

यँही से असली समस्या शुरू हुई. जिन बाबू को आगे की कार्यवाही करनी थी वो अड़ गए, की ये आज नहीं हो सकता, इसमें ये गड़बड़ है, एक महीने बाद होगा, जैसे बहुत सारे बहाने… फिर फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल घूमती रही…. मैं परेशान होकर फिर श्री भूषण से मिला, उन्होंने एक कर्मचारी को बाबू के पास भेजा, फिर भी वो मानने को तैयार नहीं था। अंततः स्वयं भूषण जी को आना पड़ा, और उन्होंने थोड़ी सख़्ती दिखाते हुए मेरा काम करवा दिया, जिसके लिए मैं उनका बहुत आभारी हूँ।

श्री भूषण से बात करके और बिजली विभाग के माहौल को देखकर मुझे कुछ बातें पता चली, जैसे :

  1. सरकार नए जॉब पैदा करने की बात करती है बेरोज़गारी दूर करने के लिए, जबकि जितने भी सरकारी विभाग में रिक्त पद है, सिर्फ वही नियुक्ति हो जाये तो बेरोज़गारी की समस्या काफी कम हो जाएगी।
  2. कुशल कर्मचारी ना होने से काम का प्रगति काफी धीमी हो जाती है, कंप्यूटर भी ठीक से उपयोग नहीं कर पाते हैं, इन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाये और उसी अनुसार काम का बंटवारा हो।
  3. एक कर्मचारी या अधिकारी पर एक से ज्यादा पद का भार है जिससे शिकायत निवारण एवं अन्य कार्यों में देरी होती है।
  4. उपभोक्ताओं को भी सहयोगात्मक रवैया दिखाना चाहिए, इससे काम शीघ्र और आराम से हो सकता है।

 

दोस्तों, मैंने जैसा अनुभव किया लिख दिया, निःसंदेह इन सब मुद्दों पर सबकी राय अलग हो सकती है… अंत में मैं शशि चंद्र भूषण जी को एक बार फिर धन्यवाद देता हूँ। और उनके जैसे लोग बिजली विभाग में या किसी भी सरकारी विभाग में ज्यादा से ज्यादा हो मैं ये कामना करता हूँ।

 

धन्यवाद।

छपरा मिड डे मील हादसा: दोषी कौन?

अच्छा… तो अब यूँ ही ज़िन्दगी की कीमत लगेगी
भूखे मरते थे पहले अब पेट भरने पे मौत मिलेगी
मृत देह पर चढ़कर राजनीति करने वाले वाचाल वीर
क्या अब रक्त पीकर तुम्हारी क्षुधा को शांति मिलेगी ?

मध्याहन भोजन की योजना बनी शिक्षा के प्रचार को
या बिचौलिए, राजनीतिक लम्पट और बाबुओं के उद्धार को ?

होनी या अनहोनी तो हो गयी, पर, दोष किसका है ?
तुम तो दोषी हो ही नहीं सकते, दूध के धुले जो हो…
व्यवस्था दोषी नहीं, इसे तुमने जो बनायीं है…

हम दोषी हैं ? नहीं नहीं तुम वोट की ख़ातिर ऐसा कह नहीं सकते
किन्तु इस शुभ अवसर पर तुम राजनीति किये बिना रह नहीं सकते

फिर दोषी कौन ? गरीबी ? अमीरी ? लालच ? मजबूरी ? देश ?
राज्य ? समाज ? नीति निर्माता ? या फिर कोई नहीं…

ह्म्म्म्म….

कोई दोषी नहीं… सच में तुम्हे पता नहीं ? … तुम्हे पता है…
तुम्हे पता है दोष किसका है… मुझे भी…

दोषी है पेट… पापी पेट… भूखा पेट…. मेरा पेट… तुम्हारा पेट…
पेट ही दोषी, तो, तुम्हे मौत क्यों नहीं आती ?

नहीं पता ना… मुझे पता है… क्योंकि…
हमारा पेट… अन्न का भूखा… तुम्हारा पेट… धन का भूखा…

मुझे छपरा के बारे में कुछ कहना है…

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बिहारी

शोर

(छपरा में ध्वनि प्रदुषण बहुत बढ़ चला है । यह कविता उसी के ऊपर एक प्रतिक्रिया है ।)

सड़क पे बहुत शोर है यहाँ,

नयी बनी पक्की राहों पे,

चिल्लाकर बढ़ने का,

बहुत जोर है यहाँ ।

कुशाषण के दिन ख़त्म हुए,

बेसब्री के बादल अभी तो शुरू हुए है छटना,

और तुमने लाइन तोड़ शुरू कर दिया बढ़ना,

अरे भाई, और भी बहुत लोग है यहाँ ।

सफ़र शान्ति से कट जाए,

जिंदगी का सफ़र तो बस कट ही रहा है,

भीतर तक भेदती तुम्हारी गाड़ियों की आवाज़े,

सुकून है कहाँ?

नितीश कुमार

मेरा छोटा सा शहर छपरा

अधपकी सी राह,
धुल बहुत उडाती है ।
अलकतरे से बनी सड़क,
इसी रास्ते में थोड़ी दूर आगे आती है ।
ये सूखे पेड़ नल के लिए उखड़े थे,
पानी नल का अभी तक किसी ने नहीं पीया,
बेचारे पेड़ो को तो मिलता था ।
नल कल आएगा,
अभी हाथो पे बहुत है भरोसा,
नगरपालिका पे नहीं,
उनकी भी कुछ खास नहीं चलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

राही के लिए,
अभी भी दो चार खिड़कियाँ खुलती है,
हां, पानी सिर्फ एक से मिलती है,
मिसरी पूछना,
शायद दुकानदार दे दे तोड़ के,
न होगा तो देगा मीठा फोड़ के,
ज्यादा का इरादा दिखाना, पर,
दे देना हिसाब जोड़ के,
भाई साहब, दूकान उतनी भी नहीं चलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

सबके कपडे गंदे है,
साफ़ कपडे हर मकान के,
आगे – पीछे, ऊपर – निचे लटक रहे है,
झाग वाला पानी,
हर नाली में बहता दिख जाता हैं,
पसीना हैं कॉलर के कालेपन का कारण,
और कल की शादी में,
उफ़, लग गई थी थोड़ी सी हल्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

हमसफ़र और आप,
दोनों झूमते हुए चलेंगे,
दर्द भरा गाना बहुत तेज बजता है यहाँ रास्ते भर ।
एक दो को छोड़कर,
टेम्पो में किसी को नहीं जल्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

गाँव की तरह तो नहीं,
पर हां लगभग
कुछ ही अंतर पे
कोई पूछ लेता है,
आप उनके परिवार से तो नहीं?
उनके बेटे तो नहीं?
माफ़ कीजियेगा, आपकी शक्ल बहुत हैं फलां से मिलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

इस छोटे से शहर में,
बिछड़े, बार बार मिलते है,
बहुत दिन बाद जो मिला
है यकीं वो शहर में नहीं था
कहेगा, की इतने कम रुपयों
में बीबी बच्चो का पेट नहीं पलता,
रसोई रोज नहीं जलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

बरामदे में लालटेन,
कोशिश करता रहता हैं, जलने की,
भीतर कमरे में इमरजेंसी लाईट का सहारा है,
शाम वो खुशनसीब,
जिस दिन ऊँचे टंगे बल्ब टिमटिमाते
वोल्टेज बढ़ा नहीं, जबकि पंखे तो चले नहीं जी पुरे सर्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

सुबह की भीड़ के 6 ही मंजिल,
रेल, स्कूल, दफ्तर,
दूकान, सिनेमा और मंदिर ।
शाम की भीड़ को,
इस छोटे से शहर की
छोटी – छोटी गलियां
है निगलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

नितीश कुमार

औरत क्यों रोती है?

एक छोटे लड़के ने अपनी माँ को रोते देख पूछा,

“तुम क्यों रो रही हो?”

“क्योंकि मैं एक औरत हूँ|”, उसने उसे बताया|

लड़के ने कहा,

“मुझे समझ नहीं आता|”

उसकी माँ ने उसे गले लगाया और कहा,

“और तुम कभी समझ नहीं पाओगे|”

बाद में छोटे लड़के ने अपने पिता से पूछा,

“माँ क्यों बिना किसी कारण के रोने लगती है?”

“सभी महिलाएं बिना किसी कारण के रोती हैं|”

उसका पिता इससे ज्यादा कुछ न कह सका| छोटा लड़का समय के साथ बड़ा हुआ और अपने पिता की तरह एक समझदार आदमी बन गया| परन्तु अभी भी वह नहीं समझ पाया था की महिलाएं क्यों रोती हैं?

अंत में वह थक हार कर भगवान के पास पंहुचा| उसने भगवान से पूछा,

“भगवान, महिलाएं इतनी आसानी से क्यों रो देती हैं?”
 
भगवान ने कहा,

“जब मैंने औरत बनाया तो उसे कुछ विशेष बनाया|

मैंने सांसारिक बोझ उठाने के लिए उसके कंधों को काफी मजबूत बनाया, साथ ही तुम्हारे आराम के लिए पर्याप्त कोमलता दी|

मैंने उसे अंदरूनी ताकत दी, प्रसव-वेदना सहने के लिए, अपने बच्चों से मिलने वाले निरंतर अस्वीकृति और तिरस्कार सहने के लिए|

मैंने उसे ऐसी कठोरता दी जो उसे सबके द्वारा त्यागने या विषम परिस्थितियों में भी अपने कर्मों से न डिगा पाए और बीमारी और थकान के बावजूद अपने परिवार का ख्याल बिना किसी शिकायत के करती रहे|

मैंने उसको सभी परिस्थितियों में अपने बच्चों को प्यार करने के लिए संवेदनशीलता दी चाहे उसका बच्चा उसे कितनी भी बुरी तरह से चोट पहुचाये|

मैंने उसे ताकत दी जिससे वह अपने गलत पति को भी संभाल सके और उसके हृदय की पसली बनकर उसकी रक्षा करे|

मैंने उसे यह ज्ञान दिया कि एक अच्छा पति कभी अपनी पत्नी को दर्द नहीं देता, लेकिन कभी कभी उसकी ताकत और उसके बुद्धिमता की परीक्षा लेता है, यह पता करने को की वो हर कदम पर उसके साथ अडिग खड़ी है|

और अंत में, मैंने एक आंसू दे दिया उसे, बहाने को|  यह उसे विशेष रूप से उपयोग करने के लिए दिया, जब भी उसे इसकी जरुरत महसूस हो, जब भी यह आवश्यक हो|”

“इसलिए हे मेरे प्यारे पुत्र”, भगवान ने आगे कहा,

“एक औरत की सुंदरता उन कपड़ो में नहीं जो वो पहनती है, उस शरीर – सौष्ठव में नहीं है जो उसके पास है, या उस अंदाज में नहीं है जिस तरह से वह अपने बाल में कंघी करती है|

एक औरत की खूबसूरती उसकी आँखों में देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह उसके हृदय का द्वार है जहाँ प्रेम का निवास है|”

ज़िन्दगी सुरक्षा नहीं, सुरक्षा के अवसर देती है

एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता भटक गया| एक जगह रुक कर उसने चारो तरफ देखा, शायद कोई रास्ता निकल आये| तभी उसने देखा एक विशालकाय शेर उसकी तरफ ही बढ़ा आ रहा है| कुत्ते की सांस रूक गयी.

 “आज तो मैं गया काम से…”, उसने सोचा|

तभी उसने सामने कुछ सूखी हड्डियाँ पड़ी देखी| उसे एक तरकीब सूझी| वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसने लगा और ऊँची आवाज़ में बोलने लगा,

 “वाह! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है| एक और मिल जाए तो पूरी दावत हो जाएगी!”

कुत्ते ने जोर से डकार मरते हुए कहा| इस बात को सुनकर शेर सकते में आ गया.
उसने सोचा,

“ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है! जान बचा कर भागो!”

और शेर वहां से चम्पत हो गया.

कुत्ते के सामने ही एक पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा देख रहा था| उसने सोचा यह मौका अच्छा है शेर को सारी कहानी बता देता हूँ – शेर से दोस्ती हो जाएगी और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा दूर हो जायेगा. वो फटाफट शेर के पीछे भागा. कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया की कुछ गड़बड़ है| उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी की कैसे कुत्ते ने उसे बेवक़ूफ़ बनाया है|
शेर जोर से दहाड़ा,

“चल मेरे साथ अभी उसकी जीवन-लीला समाप्त करता हूँ…”,

और बन्दर को अपनी पीठ पर बिठा कर शेर कुत्ते की तरफ लपका|

इधर कुत्ते ने हिम्मत नहीं हारी और उसने इस समस्या से बचने की तरकीब सोच ली| कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसकी तरफ पीठ करके बैठ गया और जोर जोर से बोलने लगा,

“इस बन्दर को भेजे हुए एक घंटा हो गया, निकम्मा अबतक एक शेर फाँस कर नहीं ला सका!”

इतना सुनते ही बन्दर उछलकर पेड़ पर जा बैठा और शेर दुम दबाकर भाग गया|

राष्ट्रीय स्तर पर हमारे खिलाडी

आजकल भारत में खेलों को काफी महत्व दिया जा रहा है. क्रिकेट, हॉकी, शतरंज, टेनिस और बैडमिन्टन में तो विश्व स्तर के खिलाडी हैं.  हमारे बिहार और छपरा में प्रतिभा की कमी नहीं हैं| लेकिन हमारे राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक के भी खिलाडी बहुत मुश्किल से मिलते हैं. हमारे यंहा प्रतिभा तो है पर उनपे किसी की दृष्टि नहीं, उन्हें मौका और सही प्रशिक्षण नहीं मिलता.
हम सबके पास खेलो से जुडी विभिन्न समस्यांए और उनके भरसक समाधान भी हैं.
आप अपने विचारों से हमें भी अवगत करायें…

धन्यवाद

बिहारी

चौपालः आपके विचारों का आदान प्रदान

आपके अपने ब्लॉग साइट “चौपाल” का पहला लेख आपकी और हमारी भाषा में…

छपरा का परिचय कराने की आवशयकता नहीं है|  इसकी भोजपुरी विरासत, भरा पूरा इतिहास, धार्मिक आस्था और महापुरुषों से सुसस्जित स्मृतियाँ हैं|

वैसे छपरा बिहार राज्य के सारण जिले का मुख्यालय है| छपरा की जड़े और छपरा से जुड़े लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं| चौपाल का पहला लेख हम सारी दुनिया में फैले बिहारियों को और छपरा वासियों को समर्पित करते हैं| आज हम बहुत उत्साह के साथ आपको आपकी देवनागरी लिपि में विचारों के आदान प्रदान के लिए आमंत्रित करते हैं|

आपका चौपाल पर बहुत बहुत स्वागत है|

धन्यवाद

आपका अपना
बिहारी