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Archive for the ‘कवितायेँ’ Category

छपरा मिड डे मील हादसा: दोषी कौन?

अच्छा… तो अब यूँ ही ज़िन्दगी की कीमत लगेगी
भूखे मरते थे पहले अब पेट भरने पे मौत मिलेगी
मृत देह पर चढ़कर राजनीति करने वाले वाचाल वीर
क्या अब रक्त पीकर तुम्हारी क्षुधा को शांति मिलेगी ?

मध्याहन भोजन की योजना बनी शिक्षा के प्रचार को
या बिचौलिए, राजनीतिक लम्पट और बाबुओं के उद्धार को ?

होनी या अनहोनी तो हो गयी, पर, दोष किसका है ?
तुम तो दोषी हो ही नहीं सकते, दूध के धुले जो हो…
व्यवस्था दोषी नहीं, इसे तुमने जो बनायीं है…

हम दोषी हैं ? नहीं नहीं तुम वोट की ख़ातिर ऐसा कह नहीं सकते
किन्तु इस शुभ अवसर पर तुम राजनीति किये बिना रह नहीं सकते

फिर दोषी कौन ? गरीबी ? अमीरी ? लालच ? मजबूरी ? देश ?
राज्य ? समाज ? नीति निर्माता ? या फिर कोई नहीं…

ह्म्म्म्म….

कोई दोषी नहीं… सच में तुम्हे पता नहीं ? … तुम्हे पता है…
तुम्हे पता है दोष किसका है… मुझे भी…

दोषी है पेट… पापी पेट… भूखा पेट…. मेरा पेट… तुम्हारा पेट…
पेट ही दोषी, तो, तुम्हे मौत क्यों नहीं आती ?

नहीं पता ना… मुझे पता है… क्योंकि…
हमारा पेट… अन्न का भूखा… तुम्हारा पेट… धन का भूखा…

शोर

(छपरा में ध्वनि प्रदुषण बहुत बढ़ चला है । यह कविता उसी के ऊपर एक प्रतिक्रिया है ।)

सड़क पे बहुत शोर है यहाँ,

नयी बनी पक्की राहों पे,

चिल्लाकर बढ़ने का,

बहुत जोर है यहाँ ।

कुशाषण के दिन ख़त्म हुए,

बेसब्री के बादल अभी तो शुरू हुए है छटना,

और तुमने लाइन तोड़ शुरू कर दिया बढ़ना,

अरे भाई, और भी बहुत लोग है यहाँ ।

सफ़र शान्ति से कट जाए,

जिंदगी का सफ़र तो बस कट ही रहा है,

भीतर तक भेदती तुम्हारी गाड़ियों की आवाज़े,

सुकून है कहाँ?

नितीश कुमार

मेरा छोटा सा शहर छपरा

अधपकी सी राह,
धुल बहुत उडाती है ।
अलकतरे से बनी सड़क,
इसी रास्ते में थोड़ी दूर आगे आती है ।
ये सूखे पेड़ नल के लिए उखड़े थे,
पानी नल का अभी तक किसी ने नहीं पीया,
बेचारे पेड़ो को तो मिलता था ।
नल कल आएगा,
अभी हाथो पे बहुत है भरोसा,
नगरपालिका पे नहीं,
उनकी भी कुछ खास नहीं चलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

राही के लिए,
अभी भी दो चार खिड़कियाँ खुलती है,
हां, पानी सिर्फ एक से मिलती है,
मिसरी पूछना,
शायद दुकानदार दे दे तोड़ के,
न होगा तो देगा मीठा फोड़ के,
ज्यादा का इरादा दिखाना, पर,
दे देना हिसाब जोड़ के,
भाई साहब, दूकान उतनी भी नहीं चलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

सबके कपडे गंदे है,
साफ़ कपडे हर मकान के,
आगे – पीछे, ऊपर – निचे लटक रहे है,
झाग वाला पानी,
हर नाली में बहता दिख जाता हैं,
पसीना हैं कॉलर के कालेपन का कारण,
और कल की शादी में,
उफ़, लग गई थी थोड़ी सी हल्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

हमसफ़र और आप,
दोनों झूमते हुए चलेंगे,
दर्द भरा गाना बहुत तेज बजता है यहाँ रास्ते भर ।
एक दो को छोड़कर,
टेम्पो में किसी को नहीं जल्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

गाँव की तरह तो नहीं,
पर हां लगभग
कुछ ही अंतर पे
कोई पूछ लेता है,
आप उनके परिवार से तो नहीं?
उनके बेटे तो नहीं?
माफ़ कीजियेगा, आपकी शक्ल बहुत हैं फलां से मिलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

इस छोटे से शहर में,
बिछड़े, बार बार मिलते है,
बहुत दिन बाद जो मिला
है यकीं वो शहर में नहीं था
कहेगा, की इतने कम रुपयों
में बीबी बच्चो का पेट नहीं पलता,
रसोई रोज नहीं जलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

बरामदे में लालटेन,
कोशिश करता रहता हैं, जलने की,
भीतर कमरे में इमरजेंसी लाईट का सहारा है,
शाम वो खुशनसीब,
जिस दिन ऊँचे टंगे बल्ब टिमटिमाते
वोल्टेज बढ़ा नहीं, जबकि पंखे तो चले नहीं जी पुरे सर्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

सुबह की भीड़ के 6 ही मंजिल,
रेल, स्कूल, दफ्तर,
दूकान, सिनेमा और मंदिर ।
शाम की भीड़ को,
इस छोटे से शहर की
छोटी – छोटी गलियां
है निगलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

नितीश कुमार