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Archive for जुलाई, 2011

शोर

(छपरा में ध्वनि प्रदुषण बहुत बढ़ चला है । यह कविता उसी के ऊपर एक प्रतिक्रिया है ।)

सड़क पे बहुत शोर है यहाँ,

नयी बनी पक्की राहों पे,

चिल्लाकर बढ़ने का,

बहुत जोर है यहाँ ।

कुशाषण के दिन ख़त्म हुए,

बेसब्री के बादल अभी तो शुरू हुए है छटना,

और तुमने लाइन तोड़ शुरू कर दिया बढ़ना,

अरे भाई, और भी बहुत लोग है यहाँ ।

सफ़र शान्ति से कट जाए,

जिंदगी का सफ़र तो बस कट ही रहा है,

भीतर तक भेदती तुम्हारी गाड़ियों की आवाज़े,

सुकून है कहाँ?

नितीश कुमार